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पहेलियाँ

Posted On: 13 Nov, 2017 कविता में

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सोच कर देखा तो सब उल्टा पाया
जो सोची थी संगरचना
उसे पलटा पाया

क्या हो गया है सबको
किस आपा धापी
किस भागम भाग
किस अफरा तफरी
में झूझ रहे हो
क्या पहेलियाँ भूझ रहे हो

खुद बनाते हो
खुद बिगाड़ते हो
किस बात का संकोच है तुमको
इतना तूफानी दिमाग कहा से लाते हो
कैसे सोच लेते हो
कब कैसे किस तरह ज़िन्दगी की लकीरो को उल्टे
गुणा भाग जोड़ बाकी करके कुछ न कुछ पलटे

जीना ही भूल गए
रहना भी भूल गए
पलना ही भूल गए
पालना भी भूल गए

कितने बड़े बनना चाहते हो
किसको गुलाम बनाना चाहते हो
किस पर धौंस चलाना चाहते हो
होगा न कोई जवाब तुम्हारे पास
क्यूंकि तुमने छोड़ दी है जीने की आस

सब फटाफट पाना चाहते हो
सब खटाखट लाना चाहते हो
बना लो गोदाम घर को
कूड़े में रहने लगो

आगे की ज़िन्दगी को जीना चाहते हो
आज की ज़िन्दगी को छीनना चाहते हो
व्यर्थ समय गवा रहे हो
बिना बात के हवा खा रहे हो

निराशा ही हाथ लगेगी
हताश हो जाओगे
आगे आगे की ज़िन्दगी सोच कर
आज ही सुपुर्दे ख़ाक हो जाओगे



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